टाइम बम पर बैठे भारत के गाँव

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भारत के गाँव टाइम बम पर बैठे हैं। जिस तरह से आर्थिक विषमता बढ़ रही है, कभी भी विस्फोट हो सकता है। 

एक तरफ़ बैंक कर्मचारी जिनकी सैलरी 50 हजार से डेढ़ लाख महीने है, वो 13-14 प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। वहीं भारत के आम किसान की औसत आमदनी सालाना 20000 रुपये से भी कम है। किसान 32 रुपये मसूर दाल बेचने को मजबूर हैं। इससे पहले मसूर की कीमत 60 रुपये किलो से अधिक थी। उत्पाद के मूल्य तय करने की पहली शर्त होती है, लागत और मुनाफे को जोड़ कर मूल्य तय किया जाना। इसी आधार पर आप दवाइयों से लेकर साबुन और टूथपेस्ट तक खरीदते हैं। सिर्फ कृषि उत्पाद अपवाद है। यहां यह तर्क दिया जाता कि अगर कृषि उत्पाद की कीमत बढ़ेगी तो गरीब क्या खाएंगे। इसी तर्क के माध्यम से आजादी के बाद से अब तक किसानों के साथ अन्याय हो रहा है।  किसान परिवारों की संख्या भारत की आधी आबादी से अधिक है। अर्थात कृषि उत्पाद के मूल्य नियंत्रण की बात कर देश की आधी आबादी के साथ अन्याय किया जा रहा है।

बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि अच्छे मॉनसून आने की खुशी अब किसानों से ज्यादा बड़े बड़े उद्योगपति घरानों में होती है। हो भी क्यों न, अच्छी मॉनसून आने की खबर भर से उनके शेयर में भारी उछाल आया जाता है। किसान को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता - अच्छी फसल होने पर 60 का मसूर 30 हो जाता है, टमाटर 15 रुपये किलो के बजाय 1 रुपये किलो बिकने लगता। किसानों के लिए लागत मूल्य प्राप्त करना तब भी मुश्किल होती है।

आज एक सरकारी चपरासी को 20 से 30 हजार रुपये महीने के मिलते हैं, अफसर लाखों की सैलरी लेते हैं, वहीं गरीब किसान और गरीब होते जा रहे हैं। विषमता तेज़ी से बढ़ रही है। अब किसान के बच्चों से शादी करने से भी लोग कतराते हैं। वहीं ग्रामीण स्तर पर शिक्षा और स्वास्थ्य की अत्यधिक बुरी हालत होने के कारण,  इनका शहर की लुटेरी शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था के द्वारा अमानवीय दोहन होता है। कितने मजबूर और लाचार हैं आज के किसान। नतीजा सामने है, गांव से बहुत बड़ी संख्या में शहरों को पलायन हो रहा है। गांव के खेतों के लिए किसानों को मजदूर तक नहीं मिल पाते। विस्थापन के पारिवारिक और सामाजिक दुष्प्रभाव भी आज गाँव मे देखे का सकते हैं। विस्थापन से कई अलग तरह की समस्या पैदा हो रही है। विस्थापन की भी एक सीमा है। भारत के 50 प्रतिशत आबादी का विस्थापन कैसे हो सकता है? अतः किसान तो रहेंगे ही। आप रिलायंस के पेट्रोल और बिनानी के सीमेंट खाकर तो जिंदा नहीं रह सकते। 

इन सब के बीच गाँवों में विभिन्न कारणों से बचे हुये किसानों की हालत अगर पाँच दस सालों तक ऐसे ही बिगड़ती रहे और आर्थिक विषमता बढ़ती रहे, तो विस्फोट होगा। ऐसा विस्फोट जो तथाकथित संभ्रांत और सभ्य समाज को झकझोर कर रख देखा। गृहयुद्ध की स्थिति बनेगी। किसानों के हाथों में हल के बजाये बंदूकें होंगी और इसके जिम्मेदार आप होंगे।

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