सिमटती किसान राजनीति

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हम जैसे छोटे लोग जो महीने के 15-20 दिन किसानों के साथ रहते हैं, कुछ राज्यों को छोड़ अन्य स्थानों के किसानों में समर्थन मूल्य की उत्सुकता नहीं पाते। आप बिहार, बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ वगैरह घूम लें। गुजरात भी घूम लें। आपको न्यूनतम समर्थन मूल्य  के विषय मे उत्सुकता देखने को नहीं मिलेगी। वहीं पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, खासकर बड़े किसानों में न्यूनतम मूल्य बढ़ाने को लेकर सजगता और जानकारी ज्यादा देखने को मिलती है।

फिर किसानों पर काम कर रहे सरकारी और विपक्षी नेतागण राशन पानी लेकर सिर्फ कर्जमाफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य और फसल बीमा जैसे मुद्दों तक ही क्यों सिमटे होते हैं? क्यों किसान की बुनियादी जरूरतों पर बात करने से परहेज करते हैं।

यहां आप समझ सकते हैं कि चुनावी राजनीति के भौगोलिक परिस्थितियों के अलावा किसानों के एक खास वर्ग को ही हित में रखते हुये मुद्दों का चयन किया जाता है।

कर्ज कौन लेता है? कर्ज किसे मिलता है? किस बिला पर मिलता है? कितने प्रतिशत अत्यंत छोटे किसानों को कर्ज मिलता है? कितने प्रतिशत भूमिहीन किसानों को कर्ज मिलता है? भारत में कितने प्रतिशत अत्यंत छोटे और भूमिहीन किसान हैं? कृषि हेतु लिये गये कर्ज का कितना हिस्सा कृषि पर और कितना हिस्सा बेटी की शादी, बीमारी इत्यादि पर खर्च होता है? क्या बेटी की शादी या बीमारी के लिये सरकार की योजनायें हकीकत में क्रियान्वित हो पाती हैं? कितने प्रतिशत छोटे और भूमिहीन किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपने अनाज को बेचने सरकारी मंडियों में जाते हैं? ज्यादातर किसान समर्थन मूल्य चाहते हैं या 24 घंटे बिजली पानी, खाद एवं उत्तम बीज की व्यवस्था? क्या ज्यादातर किसान अभी भी अनाज का उपयोग "वस्तु विनिमय" के तहत दूसरी आवश्यक वस्तुओं को खरीदने या अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए नहीं करते? क्या वो मंडियों का मुंह देख पाते हैं?

यहां सारे प्रश्न भी स्पष्ट हैं और इनके उत्तर भी आप सभी को मालूम है। बस थोड़ा और ध्यान देने की आवश्यकता है। कुछ और मनन करने की आवश्यकता है कि आखिर क्यों किसानों के नये पुराने नेतागण द्वारा मुद्दों में सिर्फ कर्जमाफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को ही आगे रखा जाता है? 

थोड़ी कोशिश करें तो आपको खेल समझ आने लगेगा। किसान बड़ा डरा सहमा निरीह सा वर्ग है। कुछ ही सबल और संपन्न किसान आवाज उठाने और लड़ने का माद्दा रखते हैं। इनके पास बड़ी जोत की जमीन होती है, जिसे गिरवी रख ये कर्ज लेते हैं। इनके पास सामर्थ्य और धैर्य होता है कि मंडी तक जा सकें और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपने अनाज को बेच पायें। इनके पास पैसे भी होते हैं, लाठी भी होती है और ट्रेक्टर भी होते हैं। वहीं पर छोटे और भूमिहीन किसान मूकबधिर से साधनहीन लोग होते हैं। इनमें राजनैतिक समर्थन देने या खड़े रहने या लड़ने का माद्दा नहीं होता। ये सितम के इंतहा होने पर अतिवादियों के प्रभाव में आ अन्दर के विक्षोभ को बंदूक उठाकर तो प्रकट कर सकते हैं, मगर इनकी जुबान से लच्छेदार विरोध के स्वर नहीं निकल पाते। ये उच्च और मध्यवर्गीय किसानों की तरह रंगीन पोस्टरों या ट्रैक्टरों से सजी रैली का हिस्सा नहीं बन पाते। एक दो दिनों के लिये शामिल हो भी जायें, मगर लंबा साथ नहीं दे पाते। 

आज हमारे किसानों के स्वयंभू नेतागण इसी कारणवश, अपनी राजनैतिक मजबूरी के तहत सिर्फ 10-20 प्रतिशत किसानों के मुद्दों को ही उठाने को मजबूर होते हैं, जैसे देश के मजदूर संगठन असंगठित दिहाड़ी मजदूरों से दूर भागते हैं। इन्हीं 10-20 प्रतिशत किसानों के ट्रैक्टर पर चढ़ ट्रेक्टर यात्रायें निकाली जाती हैं। जुलूस और जलसों का आयोजन होता है। अच्छे काम का अच्छा चंदा भी आता है या आने की उम्मीद होती है। चुनावों में किसानों का यही छोटा सम्पन्न वर्ग "राय निर्माता" (ओपिनियन मेकर) की भूमिका भी निभाता है। 

मगर, कब तक सिर्फ चुनाव को केंद्र में रखते हुये किसान पर बातें होंगी? कबतक किसान मोहरे ही बने रहेंगे?  

इस क्रम में सामाजिक मजबूती एवं दूसरे पहलुओं पर बात करने को बहुत समय चाहिये। अतः अपनी लेखनी को इन्हीं विषयों पर केंद्रित करते हुये अभी अपनी बात समाप्त करता हूँ। कई अनुत्तरित प्रश्न हैं, उत्तर प्रत्यक्ष है, आपके आसपास है - ढूंढने की भी जरुरत नहीं, बस नजर घुमा कर देख भर लें।

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