नगर निगमों की नाकामी से डेढ लाख व्यवसायिक व दो लाख आवासीय इकाइयों पर तोडफोड व सीलिंग की तलवार फिर लटकी

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 एक बार फिर दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चल रहे अवैध व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सील करने का कार्य प्रारम्भ हो गया है, दुकानदार रोजगार खोने के डर से विरोध पर उतारू हैं और सदैव की तरह राजनैतिक रोटियां सेकने की भी बडी तैयारी है । जब तक तोडफोड व सीलिंग शुरू नहीं होती तब तक तो नगर निगम व राजनैतिक दल आंखें मूंदे पडे रहते हैं लेकिन जब हाहाकार मच जाता है तो सडक पर उतर जनता के लिए कुर्बान होने का अभिनय करते हैं। सीलिंग की कार्रवाई की देखरेख हेतु सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिसम्बर 2017 को चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार के जी राव की अध्यक्षता में तीन सदस्य निगरानी(मॉनटरिंग) समिति पुनर्नियुक्त की है, पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण(ईपीसीए) के अध्यक्ष भूरेलाल व सेवानिवृत मेजर जनरल सोम झींगान जिसके सदस्य हैं। समिति वर्ष 2006-11 में भी यह कार्य कर चुकी है। वर्तमान में अगर केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व दिल्ली की नगर निगमों ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उचित पक्ष रखा होता और आवश्यक कार्रवाई की होती तो वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाप्त की गई निगरानी समिति पुनर्जीवित नहीं होती। 12 जनवरी 2018 को इस मामले की अगली सुनवाई होगी, यदि दिल्लीवासियों को सीलिंग से राहत देनी है तो केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व दिल्ली की नगर निगमों को सुप्रीम कोर्ट में ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत करना होगा।
 
  हालांकि अभी कार्रवाई रिहायशी इलाकों में बिना संपरिवर्तन(कन्वर्शन)  शुल्क दिए चल रही व्यवसायिक इकाईयों पर ही हो रही है लेकिन अन्य अवैध निर्माणों के विरूद्ध भी संज्ञान लिए जाने के संकेत हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में डेढ से दो लाख अवैध निर्माण होने का हलफनामा दिल्ली के तीनों निगम पहले ही दे चुके हैं और उनके विरूद्ध कानून-व्यवस्था बिगडने का डर दिखा कार्रवाई न किए जाने के प्रति न्यायालय अपनी नाराजगी प्रकट कर चुका है । न्यायालयों की सजगता के बावजूद दिल्ली भर में अवैध निर्माण लगातार हो रहे हैं, कार्रवाई के प्रति निगम किंकर्तव्यविमूढ नजर आता है क्योंकि आम धारणा है कि निगम के बिल्डिंग विभाग के कर्मी एवं पार्षद इसके लिए वसूली करते हैं। ऐसे में सूचीबद्ध करीब दो लाख व वर्तमान मे चल रहे अवैध निर्माणों के विरूद्ध भी तोडफोड के निर्देश दिल्ली हाई कोर्ट दो सकता है। 
 
  अवैध निर्माणों के विरूद्घ कार्रवाई न होने के चलते ही वीरेन्दर दीक्षित जैसे बाबाओं के अवैध आश्रम तथा कई बाबाओं व मौलवियों के अवैध गौरखधंधे पनपते हैं। कई नामी स्कूलों ने भी भवन अधिनियमों को धता बता अवैध निर्माण किए हैं पर कार्रवाई नहीं हुई। दिल्ली में बेतहाशा अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई न होने से कानून का डर समाप्त हो गया। दुर्भाग्य की बात यह है कि दिल्ली में निर्मित करीब 44 लाख आवासीय व व्यवसायिक इकाईयों में से केवल दो लाख के ही नक्शे पारित(स्वीकृत) हैं। इतने बडे पैमाने पर हुए अवैध निर्माण हो गए और किसी के विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं होने से बिल्डर माफिया व सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों के हौंसले बढ गए। हालांकि अप्रैल 2006 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की सीबीआई जांच कर कार्रवाई करने के आदेश दिए थे पर ‘हमाम में सभी….’ के चलते जांच ठंडे बस्ते डल गई। सडकों व फूटपाथ पर भी कब्जे हो रहे हैं, आमजन का चलना फिरना भी दूभर हो गया है।
 
  चूंकि वर्ष 2006-7 में सीलिंग की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त निगरानी(मॉनटरिंग) समिति की देखरेख में हो रही थी लिहाजा सीलिंग से बचने के लिए करीब डेढ लाख व्यापारिक इकाईयों ने पंजीकरण व संपरिवर्तन शुल्क तत्काल नगर निगम को जमा करा दिया। प्रारम्भिक वर्षों में तो मिश्रित भूमि के अंतर्गत रिहायशी इलाकों में चल रहे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा संपरिवर्तन शुल्क नगर निगम को प्रतिवर्ष नियमित रूप से जमा कराया जाता रहा पर निगमों की शिथिलता व संपरिवर्तन शुल्क की राशि अधिक होने के चलते अधिकतर इकाईयों ने इसे जमा कराना बंद कर दिया। सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी के निगम पदाधिकारियों ने हालांकि समय-समय पर संपरिवर्तन शुल्क जमा न कराने वाली इकाईयों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी के बयान तो दिए पर कार्रवाई के प्रति संजीदगी नहीं दिखाई। सुप्रीम कोर्ट अवैध निर्माण व प्रतिष्ठानों के विरूद्ध कार्रवाई के प्रति लगातार निगमों को चेताती रही, उनके नाकाम रहने पर सीलिंग की कार्रवाई को निर्देशित करने हेतु सुप्रीम कोर्ट को निगरानी समिति पुनर्नियुक्त करनी पडी है। जबकि वर्ष 2010-12 के दौरान एकीकृत दिल्ली नगर निगम द्वारा अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने के प्रति सक्रियता व नियमित कार्रवाई रिपोर्ट(एटीआर) से संतुष्ट हो कोर्ट ने निगरानि समिति को समाप्त कर दिया था। दिल्ली नगर निगम के बिल्डिंग विभाग में कार्यरत भ्रष्टाचार के आरोपी कई इंजीनियरों को भी हटाया गया, बिल्डिंग विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए एकीकृत दिल्ली नगर निगम की निर्माण समिति के तत्कालीन अध्यक्ष के नाते मैंने सकरात्मक प्रयास किए। दोषी इकाईयों को 72 घंटे का नोटिस का प्रस्ताव निगम सदन द्वारा पारित कराया ताकि आरोपित इकाई कार्रवाई के कारणों को दूर कर सके। 
 
  वर्ष 2007 में यूपीए सरकार के केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने अनिधिकृत कालोनियों, गांव व झुग्गी झोपडी में 8 फरवरी 2007 तक निर्मित अवैध निर्माणों के संरक्षणार्थ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली(विशेष प्रावधान) अधिनियम को अधिसूचित किया जिससे एक वर्ष तक तोडफोड रोक दी गई। तबसे वर्ष 2011 तक एक साल और उसके उपरान्त तीन-तीन साल के लिए इस अधिनियम को विस्तार दिया जाता रहा है, इस सप्ताह फिर इसे 31 दिसम्बर 2020 तक विस्तार दिया गया है। पूर्ववर्त्ती यूपीए सरकार हो या वर्तमान एनडीए सरकार सभी अधिनियम विस्तार कर तोडफोड की लटकी तलवार से अस्थायी राहत दिए जा रहे हैं पर स्थायी समाधान देने के प्रति कोई संजीदा नजर नहीं आता है। समय की मांग है कि भवन-भूमि अधिनियम में जमीनी व यथार्थवादी बदलाव किए जाएं, आरोपित इकाई कार्रवाई से पूर्व 72 घंटे का नोटिस तथा अवैध निर्माण के लिए निगम इंजीनियरों की जबाबदेही तय की जाए।
 
वर्ष 2006-7 में दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चल रहे करीब 5000 अवैध व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सील करने से उपजे जनआक्रोश को शांत करने के लिए केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व डीडीए ने जिन सडकों पर ऐसे अवैध व्यापारिक प्रतिष्ठान चल रहे थे, दिल्ली के उन रिहायशी इलाकों की सडकों को मिश्रित भूमि के रूप में परिभाषित कर दिया। इसके अंतर्गत इन इलाकों में प्रदूषण रहित 24 श्रेणी के धंधों को जारी रखा जा सकता है जिसके लिए संबंधित इकाई को अपना व्यवसाय नगर निगम में पंजीकृत कराना होगा तथा एक बार पंजीकरण शुल्क व प्रतिवर्ष संपरिवर्तन शुल्क नगर निगम को जमा कराना होगा। 2538 गलियों को मिश्रित भूमि के निमित्त अधिसूचित किया गया है, 351 अतिरिक्त गलियों का प्रस्ताव अभी लंबित है।  यदि संपरिवर्तन शुल्क की राशि अधिक होने के लेकर विवाद है तो फिलहाल निगम 50 प्रतिशत राशि लेकर व्यवसायिक गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति प्रदान करे।

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